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शायद कोई कमी रह गई मेरे राखी के धागों में
तभी मेरे भैया की यादें धू-धू जल गई अंगारों में

वादा कर के गए थे आऊँगा डोली में तुझे बिठाने
कैसे पिया के संग जाऊँ सात फेरों के वचन निभाने

मेंहदी, रोली, कुमकुम किस हक से आज लगाऊँ
भाभी का श्रृंगार मिटा है कैसे जश्न मनाऊँ

कह दो कोई जा के उनसे बारात न लेकर आएँ
अर्थी को कंधा देने वाले हाथ बेटी को कैसे पठाए

जिनके कंधे बैठ के मेला घूम के मैं इतराई
कैसे दूँ उस भैया को नम आँखों से आज विदाई

मैं अभागन बहन तुम्हारी कैसे तुझे भुलाऊँ
तेरे शीश कटे शव को कैसे गले लगाऊँ

माँ की ममता बह निकली आँखों से सागर छलके
बाप की पथराई आँखों से आँसू तक ना ढलके

उनकी पथराई आँखों में पानी कैसे लाऊँ
तूफाँ से लड़ती नैया को साहिल कैसे पहुँचाऊँ

डर है मुझको खो ना दूँ भाई के साथ पिता भी
ऐसा ना हो कि सज जाए कहिं एक और चिता भी

उनकी आँखों से आँसू जबतक ना छलक उठेंगे
तबतक मेरे नयनों से नीर यूँ ही बहते रहेंगे

करती हूँ प्रण ऐ प्रियतम आप तभी मुझे पाओगे
काट के जब सर दुश्मन का मेरी थाल सजाओगे

 

 picture credit- DailyO