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प्रिय शताब्दी होस्टल के सथियों

मुझे यह देख कर अत्यंत हर्ष होता हैं कि, विश्वविद्यालय में पाठ्येत्तर गतिविधियों का आयोजन हो रहा है। मैं कौतुक वश आपका पोस्टर देख कर रुक गयी। उदबोधन ‘the अवेकनिंग’ ये है आपके कार्यक्रम का नाम , कार्यक्रम में ऐसे कई हिस्से हैं जिन्हें देख कर अच्छा लगा पर एक ऐसा सेंशन भी है जो ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या हम इतने असंवेदनशील है?

उस कार्यक्रम का नाम 50 शब्दों में सुसाइड लैटर लिखना. बहुत नई घटना नही जबकि यूनिवर्सिटी के एक 18 साल के लड़के ने सुसाइड कर ली… और हम सुसाइड करने की घटना को लेकर ये समझते हैं कि ये इस दुनिया का कायरतम कृत्य हैं। ऐसे कार्यक्रम को आयोजित करने के पीछे आप सबकी मंशा क्या है ….. से मुझे कोई फर्क नही पड़ता लेकिन यह दिखाता है कि हम मानसिक स्वास्थ्य को लेकर और खुद सुसाइड नोट के लिखे जाने की मंशा के पीछे के विमर्श पर कितने असंवेदनशील हैं।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पीछे कुछेक सालों में अमूमन हर वर्ष एक सुसाइड का केस दर्ज हुआ है। जब कोई व्यक्ति जीवन के बजाए मृत्यु को गले लगाता है तो ये सोचने वाली बात है कि जीवन की अपेक्षा उसे मृत्यु ज्यादा सरल लगी , ऐसा इसलिए नही था कि वो कायर है___ ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उसको सही समय पर मदद नही मिली। किसी संस्थान में जब कोई आत्महत्या चुनता है तो वो उस संस्थान के सड़ चुकी व्यवस्था को इंगित करता है। जब कोई व्यक्ति समाज मे आत्महत्या को चुनता है तो वो ये इशारा होता है कि आपका समाज भिन्न विचारों एवं व्यक्तियों के लिए नही है। बतौर छात्र हमे कम से कम अपने साथ वालों के प्रति इतना संवेदनशील होना चाहिये कि कम से कम हम ऐसे किसी की संस्थानिक हत्या को कॉम्पिटिशन को कॉम्पिटिशन के तौर पर पेश न करें।

मुझे जाहिर तौर पर आयोजकों और परमिशन देने वालो की समझ पर न सिर्फ संदेह है अपितु ये सभी लोग घोर असंवेदनशील भी हैं ऐसा आभास हो रहा हैं।

मानसिक स्वास्थ्य के साथ एक शब्द जुड़ा होता हैं ट्रिगर पॉइंट, यनि ऐसी कोई घटना जगह या कुछ भी जो आपके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है और आपको आत्महत्या तक पहुँचा सकता हैं। एक 50 शब्दों में लिखा गया सुसाइड नोट आपके ही होस्टेल के कई छात्रों के लिए न सिर्फ ट्रिगरिंग है, बल्कि उन्हें उस ओर धकेलने के लिए प्रोत्साहित भी कर सकता हैं , जिसके परिणाम भयंकर हो सकते हैं।

इस कॉम्पिटिशन का आयोजन करके अपने उन सभी लोगो का मज़ाक बना दिया जो अब हमारे बीच नही है और जो रोज़ ज़िन्दगी और आत्म हत्या के बीच झूल रहे है। वो चाहे इस देश के किसान हो, हाशिये पर खड़े दलित हो। तमाम तरह के डिप्रेशन से झूझ अपनी जान लेने वाले लोग हो। समलैंगिक और ट्रांस समुदाय के लोग हों महिलाएं हो और आपके ही जैसे अन्य छात्र हो।

यदि आपने इस कॉम्पिटिशन को इस लिहाज़ से रखा है कि लोग इसके प्रति संवेदनशील होंगे तो भी आप गलत है क्योंकि तब आपका साबका किसी के भी सुसाइड नोट से नही हुआ है।ये बहुत दुःखद है कि मुझे उनके नाम यहां लिखने पड़ रहे हैं, जो अगर होते तो दुनिया थोड़ी बेहतरी की ओर बढ़ रही होती वर्जिनया वुल्फ़ और रोहित वेमुला।

और ऐसे अनगिन लोग जो दुनिया को कुछ देना चाहते थे औऱ खुद को केवल एक सुसाइड नोट ही दे पाए। कई तो ऐसे भी थे जो नोट नही लिख पाये और कई ऐसे जिनके सुसाइड नोट आप तक पहुँच भी नही सके।

कुछ लोग आकर कह सकते है कि इतनी सी बात के लिए इतना लिख़ने कि क्या ज़रूरत है, मसला ये है कि एक आंकड़ा बद्ध सामाज और जहां मृत्यु पर संवाद हीनता हो उसमे ऐसे ही सुसाइड नोट लिखने के कॉम्पटीशन को ही प्रोत्साहित किया जा सकता हैं।

मैं ये सिर्फ मान कर कह रही कि जिन छात्रों ने ये कॉम्पटीशन ऑरेंज किया है वो मानविकी साहित्य और विज्ञान के छात्र होंगे वो _ अपने ही विषयों के मर्म को समझ नही पाये हैं। एक सफल आयोजक होना एक बड़ा टैग होता है, एक आयोजक ये सब देखता है कि कैसे हर किसी का प्रतिनिधित्व तय हो सके। एक आयोजक कई मायनों में एक नेता होता है जो खुद को आयोजक रख कर बाकियों उनकी बात कहे जाने का मौका देता हैं, उससे थोड़ी अधिक संवेदनशीलता की अपेक्षा रखी जाती है।

शिक्षा जब तक आपको संवेदनशील न करे तब वह शिक्षा व्यवस्था ही फ़ेल है, दुनिया भर के विषयों पर कॉम्पटीशन किया जा सकता था लिखने के लिए। मसलन डिप्रेशन, रोज़गार तमाम । पर यदि हम सुसाइड नोट लिखने में होड़ करेंगे ये संदेश हम सुनिश्चित करेंगे कि, दुनिया अपने ही लोगो के लिए नही हैं।

 

धन्यवाद!!

 

 

एक और डिप्रेशन और एब्यूज सरवाईवर।

 

तोषी

शोधार्थी