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संगम का दृश्य

(१)

क्यों लचकती ,महकती अब तेरी सुबह है?
हर नज़र चमचमाती
आकाशगंगा सी शाम है,

नई एक नगरी के बीच संगम मनोहर, पुराने मोहल्लों की नई रंगत, एक धरोहर
कहीं ची-ची करते विदेशी परिंदे
और हर-हर महादेव के देशी मंजीरे
कहीं खड़ा अडिग तू,
इंद्रधनुषी धोती ओढ़े,
और झुका है कहीं सतरंगी आँचल संभाले,
कहीं आस्था,औघड़,भभूति,नागा-सन्यासी,
कहीं आचमन,कमण्डल,त्रिशूल,भगवाधारी,
कहीं हाथी-घोड़े और रथ की सवारी,
कहीं ॐ भूर्भुवः और त्रिपुरान्तकारी,
कहीं स्नान,डुबकी, नाव,तिलक और मौली
कहीं दही-चूरा, तिल और लड्डू की दौरी।
सनातन की दिशा है,आस्था का संगम
जिधर भी नज़र,दृश्य हर दुर्गम।
हर तरफ अफ़रातफ़री, हर ओर हलचल
सब जा रहें है एक हो,तेरे पथ पर।
एक निश्छल सम्मोहन, जो खींचे सब यहाँ पर
तू बसा हो जैसे शिव की जटा पर।

(२)

तेरी फितरत है बदली,
अब एक किस्सा है तू
इतिहास का एक बड़ा हिस्सा है तू,
कभी अतीत को तेरे ,
झरोखे से देखकर,
होठों की सिलवटों को करीने से सेंक कर,
कहेंगे सब अब तेरी कहानी,
तू प्रयाग था,
इलाहाबाद था,
प्रयागराज है…
ये याद है सबको एकदम ज़ुबानी…

तेरी फितरत है बदली,
अब एक किस्सा है तू
इतिहास का एक बड़ा हिस्सा है तू,
कभी अतीत को तेरे ,
झरोखे से देखकर,
होठों की सिलवटों को करीने से सेंक कर,
कहेंगे सब अब तेरी कहानी,
तू प्रयाग था,
इलाहाबाद था,
प्रयागराज है…
ये याद है सबको एकदम ज़ुबानी…

[“न मंदिर से शोर आया,
न मस्ज़िद से शोर आया,
न टूटे घरौंदे से परिंदों का शोर आया,
सब चुप्पी साधे,
सब बैठे राज़ी,
जैसे घर में पड़ी हो ,बड़ी बेटी की शादी
न फूफा हैं रूठे,जो मनाना ज़रूरी,
न जीजा के नख़रे उठाना ज़रूरी,
खुशमिज़ाज़ है सबकी तबियत,
है सबकी तमन्ना,
बिटिया की शादी को है मन से करना।

कहीं लाल आँचल में पियरी है पीली,
कहीं खुशी से सबकी आँखे है गीली,
कहीं उमंग,तराने,ठहाके,गीतों की पूँछ
कहीं दीया, माला,शंखनाद की गूँज।”]

न जाने क्या धुन है,अबकी इस शहर में,
संगदिली छा सी गयी है,यहां के मौसम में,
गर्व है तू सबका,तेरे स्नेह ने बांध रखा है,
तेरी हर अदा पर ना जाने कितनों का इम्तिहान रखा है,
तू दिव्यता और भव्यता का अद्भुत मिलन है,
यादगार रहेगा,ये हम सबका कुंभ है।

यह कविता नेहा सिंह “अपराजिता” ने लिखी है.

#दिव्य_कुंभ #भव्य_कुम्भ