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Photo By- Amar Ujala

केंद्र में सत्तारूढ़ एन०डी०ए० सरकार ने सत्र के अंत में आनन-फानन में अनारक्षित वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोगों को शिक्षण संस्थाओं और सेवाओं में 10% आरक्षण देने का फैसला किया।इसके लिये संविधान संशोधन विधेयक लाया गया जिसे दोनों सदनों में पारित होने के बाद राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर भी कर दिया गया। यह मुद्दा प्रिंट मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चा का विषय बना रहा। किसी ने इसे चुनावी स्टंट कहा तो किसी ने इसे वर्तमान समय की ज़रूरत बताया।

कुछ लोगों ने इसे सवर्णों का आरक्षण बताया पर यह आर्थिक रूप से सभी अनारक्षित लोगों के लिये है। इसमें हिन्दू सवर्णों के अतिरिक्त सामान्य वर्ग के मुस्लिम, ईसाई, जैन, बौद्ध, यहूदी, सिख, पारसी आदि भी सम्मिलित होंगे।

आर्थिक आधार पर दिये जाने वाले इस आरक्षण को पहली कोशिश बताया गया जिसमें जाति से ऊपर उठकर सोचा गया। हालाँकि इसे जातिविहीन आरक्षण का पहला कदम नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह पहली बार नहीं है जब आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया गया हो। इसके पहले ऐसा प्रयास ओ०बी०सी० ग्रुप पर किया जा चुका है, जहाँ क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने का इंतज़ाम किया गया पर कम आय का प्रमाण पत्र बनवा कर बहुत से ‘क्रीमीलेयर’ वाले लोग भी वंचित बनकर आरक्षण का लाभ लेने लगे और वास्तविक वंचितों का अधिकार हड़प लिया। यही सम्भावना सामान्य वर्ग के इस आरक्षण के साथ भी है।

यदि हम निष्पक्ष होकर विचार करें तो यह जातिविहीन आरक्षण जातिविहीन समाज बनाने की दिशा में एक अच्छा प्रयास है जब बिना किसी जातीय और धार्मिक भेदभाव के पिछड़े और वंचितों तक ज़रूरी सुविधाओं को पहुँचाने की पहल हो रही है।

किसी भी समाज और राज्य का यह उत्तरदायित्व होता है कि वह अपने पिछड़े और वंचित लोगों का उत्थान करे। आरक्षण समाज के दलितों, पिछड़ों और हाशिये पर रह रहे लोगों/समूहों को मुख्य धारा में लाने का ऐसा ही एक साधन है। आरक्षण और इससे मिलती जुलती व्यवस्थाएँ दुनिया के अनेक देशों में हैं। आरक्षण वंचितों के उत्थान का अपने आप में कोई मुकम्मल साधन नहीं है लेकिन जब तक हम कोई दूसरा बेहतर उपाय नहीं खोज लेते तब तक इसको जारी रखना होगा। इसके साथ ही इस बात की सावधानी और ध्यान रखना होगा कि हम इस साधन का सही इस्तेमाल करें ताकि समाज के वास्तविक पिछड़ों को इसका लाभ मिल सके।

ओ०बी०सी० का अधिकांश हिस्सा यादव, कुर्मी, जाट ले जाते हैं। एस०सी० का अधिकांश हिस्सा चमार और जाटव आदि ले जाते हैं। एस टी का अधिकांश हिस्सा मीणा आदि सबल जातियाँ ले जाते हैं। इसके लिये हमें ऐसा सिस्टम बनाना होगा जिसमें यह सख़्त जाँच हो कि एक बार लाभ लेने के बाद उस व्यक्ति को या उसके बच्चों को दुबारा लाभ न मिले ताकि उसी समूह के अन्य ज़रूरतमंद लोगों को लाभ मिल सके।

उच्च शिक्षा में अल्पसंख्यक स्कालरशिप में भी अंसारी, शिया और सवर्ण मुस्लिम ज़्यादा होते हैं, पसमांदा नहीं।

आर्थिक रूप से कमज़ोर सामान्य(अनारक्षित) वर्ग के लिये 10% आरक्षण की इस व्यवस्था में भी यह मुमकिन है कि ब्राह्मण, कायस्थ, सैय्यद, आदि इसका ज़्यादा हिस्सा ले जाएँ।

कहने का लब्बोलुआब यह है कि किसी भी प्रकार के सुविधा वितरण में ज़्यादा सबल लोग लाइन में आगे खड़े मिलेंगे और उसी समूह के कमज़ोर लोग पीछे रहेंगे।

इसलिये ऐसी व्यवस्था बनानी पड़ेगी या ज़्यादा अच्छा होगा कि एक जाँच मंत्रालय ही बना दिया जाये जो यह जाँच करे कि पात्र व्यक्ति को वह सुविधा मिले, अपात्र को नहीं और एक बार के बाद उस व्यक्ति को उस सुविधा से रोका जाए और उस सुविधा को उसी जाति के अन्य वंचित लोगों को दिया जाये ताकि उस जाति/समूह के अन्य लोगों को लाभ मिल सके और वे मुख्य धारा में आ सकें।

एक सुझाव यह है कि सामान्य वर्ग के क्रीमी लेयर की सीमा चार या पाँच लाख वार्षिक आय तथा पिछड़े वर्ग के क्रीमी लेयर की सीमा छह लाख रखी जाये। आठ लाख वर्षिक आय काफ़ी ज़्यादा है और इसकी वजह से यह व्यवस्था मज़ाक बन जायेगी क्योंकि लगभग 95% जनता आरक्षण के दायरे में आ जायेगी और वास्तविक वंचित वंचित ही बने रहेंगे।

इसके अलावा हर वर्ग के अंदर महिलाओं का एक निश्चित कोटा रखना महिला सशक्तीकरण की दृष्टि से बेहद ज़रूरी कदम होगा।

एक और ज़रूरी बात, रोजगार के अवसर और नौकरियों का सृजन है। जब नौकरियाँ ही नहीं होंगी तो किस चीज़ का आरक्षण दिया जायेगा। इसके अभाव में सब जुमला ही साबित होगा।

कुल मिलाकर, हमें आरक्षण और सुविधाओं के वितरण का बढ़िया सिस्टम विकसित करना होगा। यदि ऐसी पारदर्शी और चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था नहीं बन पाई तो हर छोटे या बड़े समूह/जाति में कुछ लोग सवर्ण होते जाएंगे और कुछ पिछड़े। बराबरी का ख़्वाब ख़्वाब ही बना रहेगा, हक़ीक़त नहीं बन पायेगा।